पिछले कुछ सालों से देश के अवाम में चर्चा है कि मित्र राष्ट्रों ने अमरीकी अगुआई में अपने युद्धबंदी शिविर में युद्धबंदी के रूप में जकड़ कर यातना देकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हत्या कर दी। सवाल यह भी उठता है कि हत्या के कथित दोषियों अमरीका और ब्रिटेन के साथ-साथ क्या तत्कालीन रूसी सत्ताधीश भी शामिल थे?
चर्चा रही है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हत्या से पूर्व उन्हें वाटर बोर्डिंग तकनीकी से बर्बरतापूर्ण यातनायें दी गई। ये तकनीकी सिर्फ ओर सिर्फ अमरीकी ही इस्तेमाल करते हैं। अत: यह साफ हो जाता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हत्या में अमरीकियों का हाथ रहा है।
उधर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कथित तौर पर रहस्यमय रूप से लापता होने के 67 साल पूरे होने जा रहे हैं। नेताजी के अत्यन्त रहस्यमय तरीके से लापता होने के प्रकरण में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.जवाहर लाल नेहरू के पिछलग्गुओं शाहनवाज खान और एस. एन. मिश्रा की अगुआई वाली नेताजी इन्क्वारी कमेटी-1956 और जस्टिस खोसला आयोग-1970 ने जांच करने की मात्र रस्म ही निभाई है ! भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू, अमरीका-ब्रिटेन और रूस की सरकारों और इन देशों की खूफिया ऐजेन्सियों के भारी दबाव में असलियत पर पर्दा डालने के लिये इस इन्क्वारी कमेटी और जांच आयोग द्वारा जो रिपोर्ट तैयार की गई वे रिपोर्टें, उपलब्ध महत्वपूर्ण दस्तावेजी साक्ष्यों और गवाहों के बयानों परिपेक्ष्य में, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अपने गोपनीय युद्धबन्दी शिविर में युद्धबन्दी के रूप में जकड कर यातना देकर उनकी हत्या करने के दोषी अमरीकी-ब्रिटिश अत्याचारी आतंकवादियों और उनकी दुर्दान्त खतरनाक गुप्तचर ऐजेंसियों को बचाने और भारत की 110 करोड जनता को गुमराह करने हेतु तैयार किये गये दस्तावेज साबित होने लगी हैं। जस्टिस एस. के. मुकर्जी कमीशन- 1999 ने शहनवाज इन्क्वारी कमेटी-1956 और जस्टिस जी. टी. खोसला कमीशन- 1970 की रिपोर्टो को नकारते हुये साफ-साफ फाइण्डिंग्स दी है कि 18 अगस्त, 1945 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हवाई दुर्घटना में मौत नहीं हुई और जापान के रिंकोजी मंदिर में जो अस्थियां हैं वे नेताजी की नहीं है। अत: साफ हो जाता है कि नेताजी के रहस्यमय ढंग से लापता होने के पीछे स्वर्गीय पंडित जवाहर लाल नेहरू व ब्रिटेन-अमरीका व रूसी सरकारों की संयुक्त साजिश रही है।
ऑल इण्डिया फारवर्ड ब्लाक के तत्कालीन महासचिव और वरिष्ठ सांसद चित्ता वासु ने तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को एक ज्ञापन देकर इस रहस्यमय प्रकरण की पुन: गम्भीरता से जांच करवाने हेतु आग्रह किया था। लेकिन ज्ञापन पर कार्यवाही होने से पूर्व ही सिंह ने पद त्याग कर दिया। 11 फरवरी, 1992 को कामरेड चित्ता वासु ने पुन: तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिम्हा राव को ज्ञापन दिया लेकिन नेहरू-गांधी परिवार व अमरीका-ब्रिटेन के दबाव में आकर उन्होंने कार्यवाही करने का आश्वासन देने के बावजूद कार्यवाही नहीं की। 25 नवम्बर, 1992 को वरिष्ठ सांसद चित्ता वासु ने संसद के दोनों सदनों, राज्यसभा एवं लोकसभा के सदस्यों (सांसदों) को, एक अपील जारी कर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रहस्यमय ढंग से लापता होने के प्रकरण की जांच की मांग की थी। इस अपील के साथ विस्तृत तथ्यात्मक प्रतिवेदन भी सलग्न किया गया था। इस तथ्यात्मक प्रतिवेदन में उन्होंने पंजाब हाईकोर्ट के भूतपूर्व न्यायाधीश जस्टिस जी. टी. खोसला की अध्यक्षता में गठित जस्टिस खोसला कमीशन द्वारा 30 जून, 1974 को प्रस्तुत रिपोर्ट की फाइण्डिंग्स के साथ-साथ अन्य कई साक्ष्य प्रस्तुत किये थे।
खोसला कमीशन के एक सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य में आईएनए डिफेंस कमेटी में वर्ष 1945-46 में कार्यरत कान्फीडेंशिल स्टेनों श्री श्यामलाल जैन, गवाह क्रम संख्या 21 ने गवाही दी थी कि स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें नवम्बर 1945 में एक पत्र टाईपराइटर पर ही डिक्टेट कर टाईप करवाया था। उन्होंने यह पत्र ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री एटली को लिखवाया था। जिसमें लिखा था कि आपके युद्ध अपराधी सुभाष चंद्र बोस को स्टालिन ने रूसी सीमा क्षेत्र में प्रवेश की इजाजत दे दी है। यह स्पष्ट रूप से ञ्जह्म्द्गड्डष्द्धद्गह्म्4 ड्डठ्ठस्र ड्ढद्गह्लह्म्ड्ड4ड्डद्य शद्घ द्घड्डद्बह्लद्ध ड्ढ4 क्रह्वह्यह्यद्बड्डठ्ठह्य है। क्योंकि ब्रिटेन-अमरीका और रूस का सहयोगी है और उसे ऐसा नहीं करना चाहिये था! कृपया आप इसको नोट करें और जैसा उचित समझें आगे कार्यवाही करें! ब्रिटिश गुप्तचर ऐजेंसियों ने भी इस ही दौरान अपनी सरकार को गोपनीय सूचना दी थी कि पंडित जवाहर लाल नेहरू को एक सीक्रेट संदेश नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मिला है। यह रिपोर्ट पंडित नेहरू द्वारा ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली को लिखे गये पत्र से मेल खाती है, वहीं खोसला कमीशन में श्यामलाल जैन,गवाह क्रम संख्या 21 द्वारा दी गई गवाही का आज तक सरकारी, गैर सरकारी, कांग्रेस पार्टी, ब्रिटिश व अमरीकी सरकारों ने, जस्टिस खोसला कमीशन-1970 या जस्टिस एम.के.मुकर्जी कमीशन-1999 के सामने या सार्वजनिक रूप से खण्डन नहीं किया है और न ही चुनौती दी गई है। यही नहीं इस रहस्यमय प्रकरण को दबाने के लिये आयोगों को वांच्छित दस्तावेज भी सरकार द्वारा जानबूझ कर उपलब्ध नहीं करवाये गये! अत: यह स्पष्ट है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस से प्राप्त गुप्त संदेश के बाद स्वर्गीय पंडित नेहरू ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली को पत्र लिखा। इसलिये अब साफ हो गया है कि स्वर्गीय पंडित जवाहर लाल नेहरू की नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रहस्यमय लापता होने के प्रकरण में लिप्तता रही है। एटली को लिखे अपने पत्र में नेताजी को युद्ध अपराधी आरोपित करने से भी पंडित नेहरू शक के दायरे में आ जाते हैं। क्योंकि इससे भी स्पष्ट हो जाता है कि पंडित नेहरू के मन में नेताजी के प्रति दुर्भावना थी तथा नेताजी की ब्रिटिश-अमरीकी और रूस सरकारों द्वारा युद्धबन्दी के रूप में युद्ध शिविर में हत्या को वे छुपाना चाहते थे। चूंकि जस्टिस एम.के.मुकर्जी आयोग-1999 ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ माना है कि 18 अगस्त, 1945 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हवाई दुर्घटना में मौत नहीं हुई है तथा जापानी रिंकोजी मंदिर में जो अस्थियां है वे नेताजी की नहीं हैं। ऐसी स्थिति में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रहस्यमयढंग से लापता होने का सीधा-सीधा तात्पर्य है कि नेताजी द्वितिय विश्वयुद्ध के मित्र राष्ट्रों ब्रिटेन-अमरीका और रूस के चंगुल में फंस गये और उन्हें युद्ध बन्दियों के शिविर में रखा गया होगा। यह इस बात से भी सही साबित हो जाता है कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली और उनकी केबीनेट ने 25 अक्टूबर, 1945 में एक प्रस्ताव को मंजूदी देकर तैयकिया था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के खिलाफ युद्धबंदी के रूप में किंग के खिलाफ युद्ध करने व दुश्मन के ऐजेंट होने के आरोप में भारत के बाहर बर्मा या मलाया में सैन्य अदालत में मुकदमा चलाया जाये और उन्हें ब्रिटेन के आधीन किसी द्वीप के गोपनीय युद्धबंदी शिविर में मृत्युदण्ड सहित अन्य कठोर दण्डों से दण्डित किया जाये। अत: साफ है कि नेताजी की युद्धबंदी यातना शिविर में दी गई यातनाओं से मौत होना सम्भव है और इसकी जानकारी स्वर्गीय पंडित नेहरू को होने की पूरी सम्भावना है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस को क्या युद्धबंदी शिविर में यातना देकर मारा गया और इसके लिये पंडित जवाहर लाल नेहरू सहित कौन-कौन दोषी हो सकते हैं। इसकी जांच होना अब गम्भीर महत्वपूर्ण एवं सर्वोच्च प्राथमिकता का मुद्दा है।
अत: इस गम्भीर प्रकरण की सच्चाई उजागर करने एवं वास्तविक दोषियों को जनता के सामने लाने के लिये मामले की जांच सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशन में नेशनल इन्वेस्टीगेशन ऐजेंसी से करवाई जाये एवं इस हेतु केन्द्र सरकार पंडित नेहरू के कार्यकाल की प्रधानमंत्री सचिवालय की नेताजी से सम्बन्धित फाईलें, पंडित नेहरू द्वारा एटली को 1945 से 1947 तक लिखे गये नेताजी सुभाष चंद्र बोस से सम्बन्धित पत्र, रूस के राष्ट्रीय संग्रहालय तथा ब्रिटेन के राष्ट्रीय संग्रहालय में उपलब्ध नेता सुभाष चंद्र बोस से सम्बन्धित अत्यन्त गोपनीय दस्तावेज तथा नेताजी से सम्बन्धित ब्रिटेन-अमरीका और रूस में उपलब्ध अत्यन्त गोपनीय युद्ध दस्तावेज, लार्ड माउण्टवेन्टन की व्यक्तिगत डायरी तथा ट्रांसफर आफ पावर से सम्बन्धित दस्तावेज, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद के नेताजी से सम्बन्धित दस्तावेज इस जांच ऐजेंसी को उपलब्ध करवाने की व्यवस्था करें। ताकि जांच ऐजेंसी सक्षमता से जांच कर सके।
सत्ताधीशों की बेरूखी को देखते हुए अब वक्त आ गया है, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रहस्यमय लापता होने, उनकी यातना पूर्वक हत्या करने वालों के चेहरे बेनकाब करने के लिये देश के अवाम को एकजुट होकर संघर्ष करने का!
चर्चा रही है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हत्या से पूर्व उन्हें वाटर बोर्डिंग तकनीकी से बर्बरतापूर्ण यातनायें दी गई। ये तकनीकी सिर्फ ओर सिर्फ अमरीकी ही इस्तेमाल करते हैं। अत: यह साफ हो जाता है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हत्या में अमरीकियों का हाथ रहा है।
उधर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के कथित तौर पर रहस्यमय रूप से लापता होने के 67 साल पूरे होने जा रहे हैं। नेताजी के अत्यन्त रहस्यमय तरीके से लापता होने के प्रकरण में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.जवाहर लाल नेहरू के पिछलग्गुओं शाहनवाज खान और एस. एन. मिश्रा की अगुआई वाली नेताजी इन्क्वारी कमेटी-1956 और जस्टिस खोसला आयोग-1970 ने जांच करने की मात्र रस्म ही निभाई है ! भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू, अमरीका-ब्रिटेन और रूस की सरकारों और इन देशों की खूफिया ऐजेन्सियों के भारी दबाव में असलियत पर पर्दा डालने के लिये इस इन्क्वारी कमेटी और जांच आयोग द्वारा जो रिपोर्ट तैयार की गई वे रिपोर्टें, उपलब्ध महत्वपूर्ण दस्तावेजी साक्ष्यों और गवाहों के बयानों परिपेक्ष्य में, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अपने गोपनीय युद्धबन्दी शिविर में युद्धबन्दी के रूप में जकड कर यातना देकर उनकी हत्या करने के दोषी अमरीकी-ब्रिटिश अत्याचारी आतंकवादियों और उनकी दुर्दान्त खतरनाक गुप्तचर ऐजेंसियों को बचाने और भारत की 110 करोड जनता को गुमराह करने हेतु तैयार किये गये दस्तावेज साबित होने लगी हैं। जस्टिस एस. के. मुकर्जी कमीशन- 1999 ने शहनवाज इन्क्वारी कमेटी-1956 और जस्टिस जी. टी. खोसला कमीशन- 1970 की रिपोर्टो को नकारते हुये साफ-साफ फाइण्डिंग्स दी है कि 18 अगस्त, 1945 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हवाई दुर्घटना में मौत नहीं हुई और जापान के रिंकोजी मंदिर में जो अस्थियां हैं वे नेताजी की नहीं है। अत: साफ हो जाता है कि नेताजी के रहस्यमय ढंग से लापता होने के पीछे स्वर्गीय पंडित जवाहर लाल नेहरू व ब्रिटेन-अमरीका व रूसी सरकारों की संयुक्त साजिश रही है।
ऑल इण्डिया फारवर्ड ब्लाक के तत्कालीन महासचिव और वरिष्ठ सांसद चित्ता वासु ने तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को एक ज्ञापन देकर इस रहस्यमय प्रकरण की पुन: गम्भीरता से जांच करवाने हेतु आग्रह किया था। लेकिन ज्ञापन पर कार्यवाही होने से पूर्व ही सिंह ने पद त्याग कर दिया। 11 फरवरी, 1992 को कामरेड चित्ता वासु ने पुन: तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिम्हा राव को ज्ञापन दिया लेकिन नेहरू-गांधी परिवार व अमरीका-ब्रिटेन के दबाव में आकर उन्होंने कार्यवाही करने का आश्वासन देने के बावजूद कार्यवाही नहीं की। 25 नवम्बर, 1992 को वरिष्ठ सांसद चित्ता वासु ने संसद के दोनों सदनों, राज्यसभा एवं लोकसभा के सदस्यों (सांसदों) को, एक अपील जारी कर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रहस्यमय ढंग से लापता होने के प्रकरण की जांच की मांग की थी। इस अपील के साथ विस्तृत तथ्यात्मक प्रतिवेदन भी सलग्न किया गया था। इस तथ्यात्मक प्रतिवेदन में उन्होंने पंजाब हाईकोर्ट के भूतपूर्व न्यायाधीश जस्टिस जी. टी. खोसला की अध्यक्षता में गठित जस्टिस खोसला कमीशन द्वारा 30 जून, 1974 को प्रस्तुत रिपोर्ट की फाइण्डिंग्स के साथ-साथ अन्य कई साक्ष्य प्रस्तुत किये थे।
खोसला कमीशन के एक सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य में आईएनए डिफेंस कमेटी में वर्ष 1945-46 में कार्यरत कान्फीडेंशिल स्टेनों श्री श्यामलाल जैन, गवाह क्रम संख्या 21 ने गवाही दी थी कि स्वर्गीय जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें नवम्बर 1945 में एक पत्र टाईपराइटर पर ही डिक्टेट कर टाईप करवाया था। उन्होंने यह पत्र ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री एटली को लिखवाया था। जिसमें लिखा था कि आपके युद्ध अपराधी सुभाष चंद्र बोस को स्टालिन ने रूसी सीमा क्षेत्र में प्रवेश की इजाजत दे दी है। यह स्पष्ट रूप से ञ्जह्म्द्गड्डष्द्धद्गह्म्4 ड्डठ्ठस्र ड्ढद्गह्लह्म्ड्ड4ड्डद्य शद्घ द्घड्डद्बह्लद्ध ड्ढ4 क्रह्वह्यह्यद्बड्डठ्ठह्य है। क्योंकि ब्रिटेन-अमरीका और रूस का सहयोगी है और उसे ऐसा नहीं करना चाहिये था! कृपया आप इसको नोट करें और जैसा उचित समझें आगे कार्यवाही करें! ब्रिटिश गुप्तचर ऐजेंसियों ने भी इस ही दौरान अपनी सरकार को गोपनीय सूचना दी थी कि पंडित जवाहर लाल नेहरू को एक सीक्रेट संदेश नेताजी सुभाष चंद्र बोस से मिला है। यह रिपोर्ट पंडित नेहरू द्वारा ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली को लिखे गये पत्र से मेल खाती है, वहीं खोसला कमीशन में श्यामलाल जैन,गवाह क्रम संख्या 21 द्वारा दी गई गवाही का आज तक सरकारी, गैर सरकारी, कांग्रेस पार्टी, ब्रिटिश व अमरीकी सरकारों ने, जस्टिस खोसला कमीशन-1970 या जस्टिस एम.के.मुकर्जी कमीशन-1999 के सामने या सार्वजनिक रूप से खण्डन नहीं किया है और न ही चुनौती दी गई है। यही नहीं इस रहस्यमय प्रकरण को दबाने के लिये आयोगों को वांच्छित दस्तावेज भी सरकार द्वारा जानबूझ कर उपलब्ध नहीं करवाये गये! अत: यह स्पष्ट है कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस से प्राप्त गुप्त संदेश के बाद स्वर्गीय पंडित नेहरू ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एटली को पत्र लिखा। इसलिये अब साफ हो गया है कि स्वर्गीय पंडित जवाहर लाल नेहरू की नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रहस्यमय लापता होने के प्रकरण में लिप्तता रही है। एटली को लिखे अपने पत्र में नेताजी को युद्ध अपराधी आरोपित करने से भी पंडित नेहरू शक के दायरे में आ जाते हैं। क्योंकि इससे भी स्पष्ट हो जाता है कि पंडित नेहरू के मन में नेताजी के प्रति दुर्भावना थी तथा नेताजी की ब्रिटिश-अमरीकी और रूस सरकारों द्वारा युद्धबन्दी के रूप में युद्ध शिविर में हत्या को वे छुपाना चाहते थे। चूंकि जस्टिस एम.के.मुकर्जी आयोग-1999 ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ माना है कि 18 अगस्त, 1945 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की हवाई दुर्घटना में मौत नहीं हुई है तथा जापानी रिंकोजी मंदिर में जो अस्थियां है वे नेताजी की नहीं हैं। ऐसी स्थिति में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रहस्यमयढंग से लापता होने का सीधा-सीधा तात्पर्य है कि नेताजी द्वितिय विश्वयुद्ध के मित्र राष्ट्रों ब्रिटेन-अमरीका और रूस के चंगुल में फंस गये और उन्हें युद्ध बन्दियों के शिविर में रखा गया होगा। यह इस बात से भी सही साबित हो जाता है कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली और उनकी केबीनेट ने 25 अक्टूबर, 1945 में एक प्रस्ताव को मंजूदी देकर तैयकिया था कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस के खिलाफ युद्धबंदी के रूप में किंग के खिलाफ युद्ध करने व दुश्मन के ऐजेंट होने के आरोप में भारत के बाहर बर्मा या मलाया में सैन्य अदालत में मुकदमा चलाया जाये और उन्हें ब्रिटेन के आधीन किसी द्वीप के गोपनीय युद्धबंदी शिविर में मृत्युदण्ड सहित अन्य कठोर दण्डों से दण्डित किया जाये। अत: साफ है कि नेताजी की युद्धबंदी यातना शिविर में दी गई यातनाओं से मौत होना सम्भव है और इसकी जानकारी स्वर्गीय पंडित नेहरू को होने की पूरी सम्भावना है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस को क्या युद्धबंदी शिविर में यातना देकर मारा गया और इसके लिये पंडित जवाहर लाल नेहरू सहित कौन-कौन दोषी हो सकते हैं। इसकी जांच होना अब गम्भीर महत्वपूर्ण एवं सर्वोच्च प्राथमिकता का मुद्दा है।
अत: इस गम्भीर प्रकरण की सच्चाई उजागर करने एवं वास्तविक दोषियों को जनता के सामने लाने के लिये मामले की जांच सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशन में नेशनल इन्वेस्टीगेशन ऐजेंसी से करवाई जाये एवं इस हेतु केन्द्र सरकार पंडित नेहरू के कार्यकाल की प्रधानमंत्री सचिवालय की नेताजी से सम्बन्धित फाईलें, पंडित नेहरू द्वारा एटली को 1945 से 1947 तक लिखे गये नेताजी सुभाष चंद्र बोस से सम्बन्धित पत्र, रूस के राष्ट्रीय संग्रहालय तथा ब्रिटेन के राष्ट्रीय संग्रहालय में उपलब्ध नेता सुभाष चंद्र बोस से सम्बन्धित अत्यन्त गोपनीय दस्तावेज तथा नेताजी से सम्बन्धित ब्रिटेन-अमरीका और रूस में उपलब्ध अत्यन्त गोपनीय युद्ध दस्तावेज, लार्ड माउण्टवेन्टन की व्यक्तिगत डायरी तथा ट्रांसफर आफ पावर से सम्बन्धित दस्तावेज, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद के नेताजी से सम्बन्धित दस्तावेज इस जांच ऐजेंसी को उपलब्ध करवाने की व्यवस्था करें। ताकि जांच ऐजेंसी सक्षमता से जांच कर सके।
सत्ताधीशों की बेरूखी को देखते हुए अब वक्त आ गया है, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के रहस्यमय लापता होने, उनकी यातना पूर्वक हत्या करने वालों के चेहरे बेनकाब करने के लिये देश के अवाम को एकजुट होकर संघर्ष करने का!



