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चिंतन शिविर फ्लाप-राजनैतिक पार्टियों की बढ़ी चिंता!

आखीरकार कांग्रेस के जयपुर चिंतन शिविर की शुरूआत करते समय पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने भाषण में जनता की दुखती रगों को छूने की जहमत तक नहीं उठाई। देश में रूपये के अवमूल्यन और पैट्रोलियम पदार्थों, रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ-साथ आम उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में हो रहे भारी इजाफे तथा सत्ताधीशों की रहनुमाई में देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर वे एक शब्द भी नहीं बोली! पाकिस्तान से सम्बन्धों पर भी वे गोलमोल ही बोली! अमरीका द्वारा ईरान को घेरने की मुहिम के बीच भारत द्वारा ईरान से क्रूड आयल खरीद में कटौती पर भी मौन रही।
इससे साफ जाहिर हो गया है कि कांग्रेस पार्टी का यह चिंतन शिविर देश के अवाम की नजर में एक फ्लाप शो से ज्यादा कुछ भी नहीं है!
इस चिंतन शिविर में न तो कुछ छन कर बाहर आया ओर न ही कुछ खुल कर सामने आया! जो कुछ सामने आया, उस से यह जरूर उजागर हो गया कि कांग्रेस के सामने आगामी लोकसभा चुनावों की जो चुनौती है, उससे निपटने के लिये राहुल गांधी रूपी बैसाखी के अलावा कुछ भी नहीं बचा है। कांग्रेसी दिग्गज राहुल गांधी रूपी बैसाखी के बूते पर इस ही साल होने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों और उनके साथ ही या फिर उनके बाद होने वाले लोकसभा चुनावों की वैतरणी पार करने की जुगत बैठा रहे हैं।  वे इस में कहां तक सफल होंगे यह तो वक्त ही बतायेगा, लेकिन एक बात साफ है कि पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों और आगामी लोकसभा चुनावों में कांग्रेस उस ही हाल में जीत का डंका बजा सकती है, जब तक विपक्षी पार्टियां अपने अन्दरूनी झगड़ों में उलझी रहेंगी।
भाजपा कर्नाटक, राजस्थान सहित कई राज्यों में अपनी अन्दरूनी नूरा कुश्ती में उलझी है, वहीं सीपीआई (एम) को छोड़ कर अन्य वामपंथी जनवादी पाटियां पश्चिम बंगाल ओर केरल से बाहर निकलने का आज तक मानस ही नहीं बना पाई है। फारवर्ड ब्लाक, सीपीआई ओर आरएसपी तो सिर्फ ओर सिर्फ सीपीआईएम की बैसाखियों पर टिकी है। इस बार माक्र्सवादी अपने इन तीनों सहयोगी पार्टियों की तरीके और सलीके से इस तरह जमीन खिसकाने वाली है कि इन तीनों पार्टियों, फारवर्ड ब्लाक, सीपीआई और आरएसपी के कोलकाता और तिरूअनन्तपुरम में बैठे आकाओं को जमीनी हकीकत समझ में आ जायेगी।
हो सकता है कि 23 जनवरी को देशप्रेम दिवस घोषित करवाने की बांग देने वाले फारवर्ड ब्लाक के दिल्ली और कोलकाता में बैठे आकाओं को नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्थापति इस क्रान्तिकारी पार्टी के वजूद को कायम रखने और इसे पुन: राष्ट्रीय पार्टी के रूप में स्थापति करने के बारे में सोचने और कर्म करने की फुर्सत मिलेगी। अन्यथा एक बात साफ है कि इस बार तो पाटिया ही साफ होता नजर आ रहा है।

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