गत रविवार को इण्डिया गेट पर, दिल्ली में चलती बस में एक पैरामेडिकल छात्रा के साथ हुए जघन्य बलात्कार के विरोध में इकठ्ठे हुए युवाओं और पुलिस की झड़पों के बीच घायल हुए दिल्ली पुलिस के कांस्टेबिल सुभाष तोमर की मौत की जांच दिल्ली हाईकोर्ट के कार्यरत न्यायाधीश (सिटिंग जज) से करवाये जाने की मांग धीरे-धीरे जोर पकडऩे लगी है।
मृतक कांस्टेबिल सुभाष तोमर की मौत गत 25 दिसम्बर को हो गई। उनकी मृत्यु के बाद उनके बड़े बेटे ने मीडिया को बताया कि रविवार को जब तोमर घायल हुए तब से लेकर उनकी मृत्यु होने तक उनकी खैर-खबर लेने दिल्ली पुलिस का कोई भी आला अफसर या राजनेता राममनोहर लोहिया अस्पताल नहीं पहुंचा। उनकी मौत के बाद सबसे पहिले एनडीए के संयोजक शरद यादव की अस्पताल पहुंचे! लेकिन अब सत्ताधारियों ने उनकी मौत पर सियासत करनी शुरू कर दी और जघन्य बलात्कार का विरोध करने वालों को मीडिया के सहयोग से कोसने लगे।
सवाल उठता है कि कांस्टेबिल सुभाष तोमर की मौत हुई कैसे? क्या दिल्ली में हुए जघन्य बलात्कार का विरोध कर रहे युवाओं के बीच घुसे असामाजिक तत्वों के कथित हमले से तोमर की मौत हुई। अथवा क्या पुलिस के लाठीचार्ज और पानी की बौछारों से मची भगदड़ में गिर कर खुद के साथियों से कुचलने से उनकी मौत हुई। तीसरा सवाल है कि उपरोक्त दोनों में से किसी एक भी कारण से घायल सुभाष तोमर की हार्टअटैक से मौत हुई। इन सवालों का जवाब तो डॉक्टरों के द्वारा संधारित किये गये चिकित्सकीय दस्तावेज और पोस्टमार्टम की रिपोर्ट और उच्चस्तरीय न्यायिक जांच के खुलासों से ही हो सकता है।
दिल्ली पुलिस संदिग्ध आरोपियों के खिलाफ ज्यादा से ज्यादा गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज कर कथित दोषियों को सजा दिलाने की पुख्ता तैयारी कर सकती है, लेकिन दिल्ली पुलिस की इस कार्यवाही से यह भी साफ नहीं हो सकेगा कि आखीर सुभाष तोमर की मौत हुई तो कैसे हुई?
अत: यह आवश्यक है कि सारे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच दिल्ली हाईकोर्ट के कार्यरत न्यायाधीश (सिटिंग जज) से करवाई जाये ताकि हकीकत साफ-साफ सामने आ सके और दोषियों को सबक मिल सके।
यह इसलिये भी जरूरी है कि गत शनिवार और रविवार को युवाओं के द्वारा रायसीना हिल्स, विजय चौक, राजपथ, साउथ ब्लाक, नार्थ ब्लाक जैसे सत्ता के केंद्रों और इण्डिया गेट पर किये गये उग्र प्रदर्शन और दिल्ली पुलिस के द्वारा आन्दोलन को बर्बरतापूर्ण तरीके से कुचलने हेतु किये प्रयासों के दौरान युवाओं, महिलाओं, युवतियों-छात्राओं, बच्चों और पत्रकारों पर पुलिस द्वारा अमानवीय तरीके से किये गये लाठीचार्ज, आंसूगैस से मची भगदड़ के बीच कथित रूप से गिर कर घायल हुए सुभाष तोमर की दिल के दौरे से तो मौत नहीं हुई है? अगर ऐसा हुआ है तो इसके लिये जुम्मेदार दिल्ली पुलिस के आला अफसरों की पहिचान सिर्फ उच्च स्तरीय न्यायिक जांच के जरिये ही हो सकती है।
इसलिये आवश्यक है कि इस प्रकरण की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच हो!
मृतक कांस्टेबिल सुभाष तोमर की मौत गत 25 दिसम्बर को हो गई। उनकी मृत्यु के बाद उनके बड़े बेटे ने मीडिया को बताया कि रविवार को जब तोमर घायल हुए तब से लेकर उनकी मृत्यु होने तक उनकी खैर-खबर लेने दिल्ली पुलिस का कोई भी आला अफसर या राजनेता राममनोहर लोहिया अस्पताल नहीं पहुंचा। उनकी मौत के बाद सबसे पहिले एनडीए के संयोजक शरद यादव की अस्पताल पहुंचे! लेकिन अब सत्ताधारियों ने उनकी मौत पर सियासत करनी शुरू कर दी और जघन्य बलात्कार का विरोध करने वालों को मीडिया के सहयोग से कोसने लगे।
सवाल उठता है कि कांस्टेबिल सुभाष तोमर की मौत हुई कैसे? क्या दिल्ली में हुए जघन्य बलात्कार का विरोध कर रहे युवाओं के बीच घुसे असामाजिक तत्वों के कथित हमले से तोमर की मौत हुई। अथवा क्या पुलिस के लाठीचार्ज और पानी की बौछारों से मची भगदड़ में गिर कर खुद के साथियों से कुचलने से उनकी मौत हुई। तीसरा सवाल है कि उपरोक्त दोनों में से किसी एक भी कारण से घायल सुभाष तोमर की हार्टअटैक से मौत हुई। इन सवालों का जवाब तो डॉक्टरों के द्वारा संधारित किये गये चिकित्सकीय दस्तावेज और पोस्टमार्टम की रिपोर्ट और उच्चस्तरीय न्यायिक जांच के खुलासों से ही हो सकता है।
दिल्ली पुलिस संदिग्ध आरोपियों के खिलाफ ज्यादा से ज्यादा गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज कर कथित दोषियों को सजा दिलाने की पुख्ता तैयारी कर सकती है, लेकिन दिल्ली पुलिस की इस कार्यवाही से यह भी साफ नहीं हो सकेगा कि आखीर सुभाष तोमर की मौत हुई तो कैसे हुई?
अत: यह आवश्यक है कि सारे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच दिल्ली हाईकोर्ट के कार्यरत न्यायाधीश (सिटिंग जज) से करवाई जाये ताकि हकीकत साफ-साफ सामने आ सके और दोषियों को सबक मिल सके।
यह इसलिये भी जरूरी है कि गत शनिवार और रविवार को युवाओं के द्वारा रायसीना हिल्स, विजय चौक, राजपथ, साउथ ब्लाक, नार्थ ब्लाक जैसे सत्ता के केंद्रों और इण्डिया गेट पर किये गये उग्र प्रदर्शन और दिल्ली पुलिस के द्वारा आन्दोलन को बर्बरतापूर्ण तरीके से कुचलने हेतु किये प्रयासों के दौरान युवाओं, महिलाओं, युवतियों-छात्राओं, बच्चों और पत्रकारों पर पुलिस द्वारा अमानवीय तरीके से किये गये लाठीचार्ज, आंसूगैस से मची भगदड़ के बीच कथित रूप से गिर कर घायल हुए सुभाष तोमर की दिल के दौरे से तो मौत नहीं हुई है? अगर ऐसा हुआ है तो इसके लिये जुम्मेदार दिल्ली पुलिस के आला अफसरों की पहिचान सिर्फ उच्च स्तरीय न्यायिक जांच के जरिये ही हो सकती है।
इसलिये आवश्यक है कि इस प्रकरण की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच हो!



