देशभर में ट्रेड यूनियनें दो दिवसीय हड़ताल पर हैं। मंहगाई पर अंकुश, न्यूनतम वेतन स्लेबों में बढोतरी, स्थायी नियुक्तियां देने, सरकारी कम्पनियों को निजी क्षेत्र को बेचने का विरोध, बैंकों का मर्जर न हो, नई पेंशन स्कीम को बंद कर पुरानी पेंशन स्कीम को चालू रखा जाये। इन वाजिब मांगों को लेकर देशभर की ट्रेड यूनियनें दो दिन की हड़ताल पर हैं। लेकिन केंद्र सत्तारूढ डॉ.मनमोहन सिंह सरकार इस हड़ताल को कोई तवज्जो नहीं दे रही है। जिसके कारण भी साफ हैं।
देश में विपक्षी दलों के भारी मतभेद हैं। वहीं ट्रेड यूनियनें किसी न किसी राजनैतिक दल से जुड़ी हैं और उसी राजनैतिक दल के ऐजेण्डे को आधार बना कर अपनी गतिविधियों का संचालन करती है।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस ट्रेड यूनियनों के बंद का विरोध कर रहे हैं। जबकि वाम जनवादी दलों से सम्बन्धित ट्रेड यूनियनें बंद में शामिल हैं। नतीजन ट्रेड यूनियनों के भारत बंद को झटका लगना ही है। एक तरफ ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस केंद्र की कांग्रेसनीत डॉ.मनमोहन सिंह सरकार का जबर्दस्त विरोध कर रही है और इस विरोध को कायम रखने े लिये वे किसी भी स्तर तक जाने के लिये तैयार हैं! लेकिन पश्चिम बंगाल में स्थानीय फायदे के लिये ममता बनर्जी ट्रेड यूनियनों याने कि मजदूरों के संघर्ष का विरोध कर रही है।
तमिलनाडू, उडीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक सहित कुछ प्रदेशों में व्यक्तिवादी पार्टियों की सरकारें होने के कारण देश की राजनीति पर स्थानीय मुद्दे और स्थानीय लोग हावी हो गये हैं और अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिये देश को रसातल में ले जाने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। जो राजनैतिक पार्टियां अपने आपको राष्ट्रवादी कहने का दम भरती है वे भी जाति-पांति, धर्म, मजहब के चक्कर में आम अवाम को भूल गई है।
अब कोई बताये कि निजी स्वार्थों की पूर्ति में लिप्त स्थानीय अवसरवादी नेताओं और उनकी भाई-भतीजों की दुकाने बनी पार्टियों से क्या उम्मीदें की जा सकती है? क्या मुकाबला करेंगी ये राजनैतिक पार्टियां कांग्रेस का!
देश में विपक्षी दलों के भारी मतभेद हैं। वहीं ट्रेड यूनियनें किसी न किसी राजनैतिक दल से जुड़ी हैं और उसी राजनैतिक दल के ऐजेण्डे को आधार बना कर अपनी गतिविधियों का संचालन करती है।
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस ट्रेड यूनियनों के बंद का विरोध कर रहे हैं। जबकि वाम जनवादी दलों से सम्बन्धित ट्रेड यूनियनें बंद में शामिल हैं। नतीजन ट्रेड यूनियनों के भारत बंद को झटका लगना ही है। एक तरफ ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस केंद्र की कांग्रेसनीत डॉ.मनमोहन सिंह सरकार का जबर्दस्त विरोध कर रही है और इस विरोध को कायम रखने े लिये वे किसी भी स्तर तक जाने के लिये तैयार हैं! लेकिन पश्चिम बंगाल में स्थानीय फायदे के लिये ममता बनर्जी ट्रेड यूनियनों याने कि मजदूरों के संघर्ष का विरोध कर रही है।
तमिलनाडू, उडीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक सहित कुछ प्रदेशों में व्यक्तिवादी पार्टियों की सरकारें होने के कारण देश की राजनीति पर स्थानीय मुद्दे और स्थानीय लोग हावी हो गये हैं और अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिये देश को रसातल में ले जाने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। जो राजनैतिक पार्टियां अपने आपको राष्ट्रवादी कहने का दम भरती है वे भी जाति-पांति, धर्म, मजहब के चक्कर में आम अवाम को भूल गई है।
अब कोई बताये कि निजी स्वार्थों की पूर्ति में लिप्त स्थानीय अवसरवादी नेताओं और उनकी भाई-भतीजों की दुकाने बनी पार्टियों से क्या उम्मीदें की जा सकती है? क्या मुकाबला करेंगी ये राजनैतिक पार्टियां कांग्रेस का!



