पिछले मंगलवार को बीटिंग रिट्रीट के साथ हमारे देश के 64वें गणतंत्र दिवस समारोह का समापन हुआ!
लेकिन हमारे इस भारत गणतंत्र के एक भी राजनेता को यह सोचने की फुरसत ही नहीं मिली कि हमने पिछले 63 सालों में क्या खोया और क्या पाया!
इन 63 सालों में हमारे लिये जो सबसे शर्मनाक हकीकत रही वह है कि देश को गणतंत्र घोषित करने से लेकर आज तक देश के नौनिहालों को एक शिक्षा पद्धति तक नहीं दे पाये। जर्मनी में 1837 में जब फैड्रिच विल्हैम ऑगस्ट फ्राबेल ने अपने देश के बच्चों के लिये किंडरगार्टेन के नाम से एक शिक्षा पद्धति दी, लेकिन जर्मनी की तत्कालीन नाजी सरकार ने फ्राबेल के विचारों का क्रान्तिकारी मानते हुए उनकी शिक्षण पद्धति पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। जर्मनी के इस क्रान्तिकारी अर्थशास्त्री की छोटे बच्चों के लिये इजाद इस शिक्षा पद्धति में अपने देश की आवश्यकताओं के अनुरूप सुधार कर रूस ने वर्ष 1947 में अपने-अपने देश में लागू किया ओर आज तक यह शिक्षा पद्धति वहां सफलता पूर्वक क्रियान्वित हो रही है।
लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यानि भारत गणतंत्र के नन्हे-मुन्हे आज भी एक सक्षम शिक्षा पद्धति का इंतजार कर रहे हैं। आखीर क्यो? क्या देश में एक भी शिक्षाविद् नहीं जो इस राष्ट्र के बच्चों के लिये भारतीय परिस्थितियों, उपलब्ध संसाधनों एवं वैज्ञानिक सोच के साथ एक समग्र शिक्षा पद्धति का निर्माण कर सके!
जिस देश के सत्ताधीशों, शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, समाज के कर्णधारों को अपने देश के नौनिहालों के लिये एक समग्र शिक्षा पद्धति के निर्माण के लिये फुर्सत नहीं हो उस देश को लोकतंत्र कहने में किसे फक्र होगा! शायद किसी को भी नहीं!
लेकिन हमारे इस भारत गणतंत्र के एक भी राजनेता को यह सोचने की फुरसत ही नहीं मिली कि हमने पिछले 63 सालों में क्या खोया और क्या पाया!
इन 63 सालों में हमारे लिये जो सबसे शर्मनाक हकीकत रही वह है कि देश को गणतंत्र घोषित करने से लेकर आज तक देश के नौनिहालों को एक शिक्षा पद्धति तक नहीं दे पाये। जर्मनी में 1837 में जब फैड्रिच विल्हैम ऑगस्ट फ्राबेल ने अपने देश के बच्चों के लिये किंडरगार्टेन के नाम से एक शिक्षा पद्धति दी, लेकिन जर्मनी की तत्कालीन नाजी सरकार ने फ्राबेल के विचारों का क्रान्तिकारी मानते हुए उनकी शिक्षण पद्धति पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। जर्मनी के इस क्रान्तिकारी अर्थशास्त्री की छोटे बच्चों के लिये इजाद इस शिक्षा पद्धति में अपने देश की आवश्यकताओं के अनुरूप सुधार कर रूस ने वर्ष 1947 में अपने-अपने देश में लागू किया ओर आज तक यह शिक्षा पद्धति वहां सफलता पूर्वक क्रियान्वित हो रही है।
लेकिन दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र यानि भारत गणतंत्र के नन्हे-मुन्हे आज भी एक सक्षम शिक्षा पद्धति का इंतजार कर रहे हैं। आखीर क्यो? क्या देश में एक भी शिक्षाविद् नहीं जो इस राष्ट्र के बच्चों के लिये भारतीय परिस्थितियों, उपलब्ध संसाधनों एवं वैज्ञानिक सोच के साथ एक समग्र शिक्षा पद्धति का निर्माण कर सके!
जिस देश के सत्ताधीशों, शिक्षाविदों, वैज्ञानिकों, समाज के कर्णधारों को अपने देश के नौनिहालों के लिये एक समग्र शिक्षा पद्धति के निर्माण के लिये फुर्सत नहीं हो उस देश को लोकतंत्र कहने में किसे फक्र होगा! शायद किसी को भी नहीं!



