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अब जनता भी समझना चाहती है!

खुदरा व्यापार में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के मुद्दे को लेकर संसद में गतिरोध लगातार जारी है। लोकसभा की कार्यवाही पिछले चार दिनों से बाधित है। यही हाल राज्यसभा में भी देखने को मिल रहा है।
सवाल उठता है कि लोकसभा में अगर माननीय सदस्य कोई प्रस्ताव लाते हैं तो उसे स्वीकार या अस्वीकार करने का फैसला कौरन करेगा? लोकसभा के स्पीकर या फिर सत्तारूढ दल! स्थापित कानूनों और नियमों के तहत किसी भी सांसद द्वारा लोकसभा सदन में कोई प्रस्ताव पेश करने का नोटिस दिया जाता है तो उस पर फैसला लोकसभा स्पीकर को करना होता है कि उसे स्वीकार किया जाये या फिर अस्वीकार। इस मामले में स्पीकर का फैसला अन्तिम होता है।
अब सवाल उठता है कि एफडीआई पर नियम 184 के तहत लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष किसी सांसद या सांसदों ने क्या कोई प्रस्ताव या प्रस्ताव का नोटिस पेश किया है? अगर पेश किया है, तो फिर पिछले चार दिनों में स्पीकर साहिबा ने उस प्रस्ताव को स्वीकार किया है या अस्वीकार! आम अवाम इस पर वास्तविक स्थिति जानना चाहता है!
जब लोकसभा में एफडीआई पर नियम 184 के तहत प्रस्ताव या प्रस्ताव का नोटिस स्पीकर के सामने प्रस्तुत हो गया है तो स्पीकर को जो भी फैसला करना है कर दें ताकि सदन में जारी गतिरोध खत्म हो और संसदीय कार्य बाधिन न हो। या फिर स्पीकर अगर कोई फैसला लेने के मामले में असमंजस में है तो उसे सदन में निर्णय के लिये रख दें ताकि सदन उस पर फैसला ले ले।
दरअसल लोकसभा में नियम 184 के तहत बहस कराने से वामपंथी जनवादी दलों को छोड़ कर देश की सभी राजनैतिक पार्टियों की कलई खुलने की स्पष्ट स्थिति है। खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे पर सदन और सदन के बाहर राजनैतिक पार्टियां जो रूख अपनाती रही है या अब अपनायेंगी, उसकी असलियत अवाम के सामने आने से राजनैतिक पार्टियों के मुखौटे उतर जायेंगे और आगामी लोकसभा चुनावों में उन्हें अपनी कथनी-करनी का खमियाजा भुगतने के लिये मजबूर होना पड़ेगा! परमाणु मुद्दे पर वामपंथी जनवादी दलों को जो खमियाजा भुगतना पड़ा था, वह साफ है! लेकिन खुदरा व्यापार में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश मामले में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, डीएमके सहित कुछ दलों की दुतरफा चालों का खमियाजा कांग्रेस के साथ-साथ उन्हें कितनी गहराई से जनता भुगतवायेगी, यह तो अवाम द्वारा अपने वोट के अधिकार का उपयोग करते समय ही पता चलेगा। वैसे मंहगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी जैसे मुद्दों से अवाम की नाराजगी किसी से भी छुपी हुई नहीं है और सरकार की कैश सब्सीडी की नौटंकी से भी यह नाराजगी खत्म होने वाली नहीं है।

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