नई दिल्ली (ओएनएस) पूरी ताकत झौंकने और दिल्ली के रामलीला मैदान में पूरी भीड़ जुटाने के बावजूद प्रधानमंत्री डॉ.मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गांधी के सम्बोधनों के नकारात्मक प्रभाव के चलते कांग्रेस पार्टी में भी अगले साल लोकसभा चुनाव करवाने की सुगबुगाहट शुरू हो गई है।
ऑब्जेक्ट में हमने लगभग एक साल पहिले ही साया कर दिया था कि देश में या तो मध्यावधि चुनाव होंगे या फिर अघोषित आपातकाल लागू होगा। आज स्थिति यह बन गई है कि कांग्रेस मध्यावधि चुनावों की तैयारी में जुट गई है वहीं डॉ.मनमोहन सिंह सरकार लोकतंत्र की धज्जियां उड़ा कर सामन्तवादी तरीके से फैसले ले रहे हैं।
अब चूंकि अमरीका में बराक ओबामा दूसरी टर्म के लिये राष्ट्रपति चुन लिये गये हैं, इससे डॉ.मनमोहन सिंह को काफी सम्बल मिला है और सत्तारूढ़ दल अघोषित आपातकाल के रास्ते चल कर देश को मध्यावधि चुनावों में झौंक सकता है।
डॉ.मनमोहन सिंह को एक अर्थशास्त्री के रूप में साफ-साफ पता है कि देश की मुद्र रूपये का लगभग 40 प्रतिशत अवमूल्यन हो चुका है और चूंकि रूपये की क्रय शक्ति वैधानिक रूप से 50 प्रतिशत और व्यवहारिक रूप से 60 से 65 प्रतिशत घट चुकी है। उन्हें यह भी पता है कि जब रूपये की क्रय शक्ति घट गई है, ऐसी स्थिति में मंहगाई पर काबू पाना निहायत मुश्किल ही नहीं नामुमकीन भी है। इस स्थिति से सभी राजनैतिक पार्टियां भी वाकिफ हैं और उन्होंने भी मंहगाई पर बात करना छोड़ दिया है।
लेकिन रूपये की घटती जा रही क्रय शक्ति से उत्पन्न हो रही मंहगाई से आम अवाम बेहद नाराज है और अवाम की नाराजगी कब विस्फोट बन कर किस तरह प्रगट होगी, इस का अन्दाज किसी को नहीं है। मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी अन्दरूनी झगड़ों के कारण पस्त है। गुजरात कर्नाटक, राजस्थान, उत्तर प्रदेश में पार्टी अपनों से ही परेशान है वहीं कांग्रेंस राजस्थान, गुजरात सहित अन्य प्रान्तों में बागी भाजपाइयों को पर्दे के पीछे रह कर समर्थन देकर भाजपा को कमजोर करने का प्रयास कर रही है।
उधर पश्चिम बंगाल में वाम जनवादी मोर्चे और ममता की तृणमूल कांग्रेस में गहरी उठापटक चल रही है। मध्यावधि चुनावों की सुगबुगाहट के चलते ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनाव पहिले के तैय कार्यक्रम से हटकर आगामी जनवरी में ही करवाने की तैयारी कर ली है।
कांग्रेस पार्टी के आका राष्ट्रीय परिस्थितियों के परिपेक्ष्य में अपनी पार्टी की अवाम में गिरती साथ के चलते बेहद परेशान हैं और उनके पास अघोषित आपातकाल या फिर मध्यावधि चुनाव ही विकल्प बचे हैं।
ऑब्जेक्ट में हमने लगभग एक साल पहिले ही साया कर दिया था कि देश में या तो मध्यावधि चुनाव होंगे या फिर अघोषित आपातकाल लागू होगा। आज स्थिति यह बन गई है कि कांग्रेस मध्यावधि चुनावों की तैयारी में जुट गई है वहीं डॉ.मनमोहन सिंह सरकार लोकतंत्र की धज्जियां उड़ा कर सामन्तवादी तरीके से फैसले ले रहे हैं।
अब चूंकि अमरीका में बराक ओबामा दूसरी टर्म के लिये राष्ट्रपति चुन लिये गये हैं, इससे डॉ.मनमोहन सिंह को काफी सम्बल मिला है और सत्तारूढ़ दल अघोषित आपातकाल के रास्ते चल कर देश को मध्यावधि चुनावों में झौंक सकता है।
डॉ.मनमोहन सिंह को एक अर्थशास्त्री के रूप में साफ-साफ पता है कि देश की मुद्र रूपये का लगभग 40 प्रतिशत अवमूल्यन हो चुका है और चूंकि रूपये की क्रय शक्ति वैधानिक रूप से 50 प्रतिशत और व्यवहारिक रूप से 60 से 65 प्रतिशत घट चुकी है। उन्हें यह भी पता है कि जब रूपये की क्रय शक्ति घट गई है, ऐसी स्थिति में मंहगाई पर काबू पाना निहायत मुश्किल ही नहीं नामुमकीन भी है। इस स्थिति से सभी राजनैतिक पार्टियां भी वाकिफ हैं और उन्होंने भी मंहगाई पर बात करना छोड़ दिया है।
लेकिन रूपये की घटती जा रही क्रय शक्ति से उत्पन्न हो रही मंहगाई से आम अवाम बेहद नाराज है और अवाम की नाराजगी कब विस्फोट बन कर किस तरह प्रगट होगी, इस का अन्दाज किसी को नहीं है। मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी अन्दरूनी झगड़ों के कारण पस्त है। गुजरात कर्नाटक, राजस्थान, उत्तर प्रदेश में पार्टी अपनों से ही परेशान है वहीं कांग्रेंस राजस्थान, गुजरात सहित अन्य प्रान्तों में बागी भाजपाइयों को पर्दे के पीछे रह कर समर्थन देकर भाजपा को कमजोर करने का प्रयास कर रही है।
उधर पश्चिम बंगाल में वाम जनवादी मोर्चे और ममता की तृणमूल कांग्रेस में गहरी उठापटक चल रही है। मध्यावधि चुनावों की सुगबुगाहट के चलते ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनाव पहिले के तैय कार्यक्रम से हटकर आगामी जनवरी में ही करवाने की तैयारी कर ली है।
कांग्रेस पार्टी के आका राष्ट्रीय परिस्थितियों के परिपेक्ष्य में अपनी पार्टी की अवाम में गिरती साथ के चलते बेहद परेशान हैं और उनके पास अघोषित आपातकाल या फिर मध्यावधि चुनाव ही विकल्प बचे हैं।



