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शर्म से डूब मरने के अलावा क्या बचेगा कामरेड़ों!

जन्तर मन्तर से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के केंद्र की संप्रगनीत कांग्रेस के डॉ.मनमोहन सिंह की अगुआई वाली केंद्र सरकार को उखाड़ फैकने के आव्हान और एनडीए के प्रमुख शरद यादव द्वारा तृणमूल कांग्रेस के जन्तर मन्तर  पर धरने में शिरकत कर डॉ.मनमोहन सिंह सरकार को विदा करने के जोरदार आव्हान ने देश की राजनीति को गर्मा दिया है। ममता बनर्जी ने दिल्ली में जन्तर मन्तर पर जो तीखे तेवर दिखाये, उससे सिर्फ कांग्रेस पार्टी में ही खलबली नहीं मची, वरन मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी के नेताओं में भी खलबली मच गई है। खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और डीजल-पैट्रोल के दामों में वृद्धि को पूरी तरह नकारते हुए ममता बनर्जी ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान करते हुए साफ-साफ कहा कि अगर लड़ाई जीतने और कांग्रेस को पस्त करने के लिये कुर्बानी देनी पड़ी तो वे अपनी जान की कुर्बानी भी देने के लिये तैयार हैं। उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि वे आगामी नवम्बर, 2012 से मंहगाई, भ्रष्टाचार, कालेधन की वापसी और कांग्रेस की अगुआई वाली डॉ.मनमोहन सिंह सरकार को पटखनी लगाने के लिये पूरे देश में घूम कर जनजागरण अभियान चलायेगी! अभियान की शुरूआत दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान से करने की भी उन्होंने घोषणा कर दी। इससे साफ हो जाता है कि ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल से निकल कर अब पूरे देश को अपना कार्यक्षेत्र बनायेगी।
ममता बनर्जी एक तीर में तीन शिकार वाली नीति पर चल रही है। सबसे पहिले वह सत्तारूढ़ दल और उसकी सरकार को उसके सामने आम अवाम के साथ शेरनी की तरह खड़ी होने का एहसास करवा रही है, वहीं माया-मुलायम के सामने सीबीआई का उदाहरण पेश कर कांग्रेस के मायाजाल से बाहर निकलने के लिये उनकी ओर इंगित कर रही है।
तीसरा निशाना वामपंथी-जनवादी पार्टियां हैं। ममता बनर्जी राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथी-जनवादी पार्टियों की भूमिका और प्रभाव को पूरी तरह ध्वस्त करना चाहती है और इसके लिये वे गैर भाजपा और गैर कांग्रेसी ऐसा मंच बनाना चाहती है जिस में वामपंथी जनवादी पार्टियों को पूरी तरह नकार दिया जाये। कांग्रेस पार्टी  भी तो आखीरकार यही चाहती है।
वैसे भी वामपंथी जनवादी पार्टियों के अगुआ खुद अपनी पार्टियों की जडें खोदने में जुटे रहे हैं। पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा में सत्तारूढ़ क्या हो गई, इन पार्टियों में वाम सामन्तवाद ने ऐसी जडें जमाई कि वाम जनवादी पार्टियों का राष्ट्रीय राजनीति से पाटिया ही साफ होने लगा। सीपीआईएम और सीपीआई निवाचन आयोग से राष्ट्रीय स्तर की पंजीकृत एवं मान्यता प्राप्त राजनैतिक पार्टियां है, लेकिन संसद में उपस्थिति ममता, माया और मुलायम की पार्टियों से भी काफी कम हैं। यही हाल आरएसपी और फारवर्ड ब्लाक का है। ले दे कर इन दोनों पार्टियों के पांच सांसद हैं, जिन्हें भी संसद में बोलते किसी ने नहीं सुना! इन पार्टियों के सांसद वामदलों की मेहरबानी से जीत कर आते हैं और इन पार्टियों के नेता वामदलों के पिछलग्गू और यसमैन की तरह इन दलों के आगे पीछे घूमते रहते हैं।
वामपंथी जनवादी दलों की छटे दशक तक जो इज्जत एकजुटता और वर्चस्व  रहा, वह आज मटियामेट हो चुका है। एक तरफ ममता बनर्जी एक दशक पहिले पनपी तृणमूल कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने की तैयारी में जुटी हैं वहीं वामपंथी  जनवादी दलों के आका अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के चलते पश्चिम बंगाल और केरल में सिमटते चले गये। सत्तारूढ़ रहते हुए सीपीआई और सीपीआईएम ने राज्यों में अपने संगठन के लिये इन्फ्रास्ट्रक्चर तो खडे कर लिये, लेकिन दोनों पार्टियां आम अवाम के अन्दर पैठ जमा नहीं पाई। आज भी ये पार्टियां ट्रेड यूनियानों के सहारे ही राज्यों में जिंदा है। फारवर्ड ब्लाक ने सत्ता में रहते हुए भी राज्यों में पार्टी का कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर खडा नहीं किया और जहां जहां पार्टी संगठन मजबूत था पार्टी के आकाओं ने अपने खुशामदियों और दुमछल्लों को वहां काबिज करवा कर संगठन की ऐसी तैसी कर दी! जहां वे अपने खुशामदियों को नहीं बैठा पाये, उन राज्यों में पार्टी संगठन को अपनी मौत मरने के लिये छोड़ दिया गया! आज पश्चिम बंगाल को छोड़ कर पूरे देश में पार्टी की हालत खस्ता है। तमिलनाडू हो या आंध्र अथवा केरल पार्टी के बद्हाल और उसमें हो रही लठ्ठमलठ्ठा के कारण आम अवाम पार्टी की तरफ देखने में ही बिदकता है। यही हालात आरएसपी के हैं।
वाम जनवादी दलों के इन हालातों ने काफी तादाद में नक्सली और माओवादी गुटों को पनपा दिया है और गरीब शोषित पीडि़त वर्ग और आदिवासियों में इन गुटों की पैठ दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है! नतीजन वामपंथी जनवादी दल शहरी क्षेत्रों में सिर्फ और सिर्फ ट्रेड यूनियनों पर आश्रित हो गये हैं। शहरी क्षेत्रों में भी ये दल अवाम की पहुंच से दूर होते जा रहे हैं या दूसरे शब्दों में अवाम इनसे दूर होता जा रहा है! ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में वामपंथी-जनवादी पार्टियों की कमजोरी का फायदा उठाया और उन्हें पटखनी लगा दी और अब उनका लक्ष्य इन दलों की राष्ट्रीय स्तर पर भूमिका एवं प्रभाव को समाप्त करना है।
लेकिन यह समझ से परे है कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के हाथों मात खाने के बाद भी वाम-जनवादी पार्टियों के आकाओं को हकीकत समझ में क्यों नहीं आ रही है? इन पार्टियों पर सांप की तरह कुण्डली मार कर बैठे वाम सामन्तवादी सोच के ये आका अपनी पार्टियों को जनआधारित पार्टी का रूप क्यों नहीं देना चाहते हैं? क्या इनके आगे आम अवाम का कोई वजूद नहीं है? क्या ये वाम सामन्तवादी सोच के आका बिना मतदाताओं के जीत कर संसद या विधानसभा में जाने की क्षमता रखते हैं? अब भी वक्त है जनता के लिये जीने का संकल्प लेकर सड़कों पर, खेत-खलियानों मे, मोहल्लों-गलियों में उतरो और लहराओ लाल फरेरे को और नारा दो कि हम जनता के साथ मंहगाई, बेरोजगारी, विदेशी दासता के खिलाफ और कालाधन वापसी केलिये पूरी तरह से संघर्ष के लिये तैयार हैं। वर्ना शर्म से डूब मरने के अलावा क्या बचेगा हुजूर कामरेडों, जब ममता दीदी इन्हीं मुद्दों पर आपका स्थान आप से छीन लेंगी!

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